देखा जाये तो बांग्लादेश चुनाव के परिणाम से केवल सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ है बल्कि संभवतः उस दौर का भी अंत हुआ है जो लंबे समय तक शेख हसीना और उनकी अवामी लीग के इर्द-गिर्द घूमता रहा। छात्र आंदोलन, आर्थिक ठहराव, भ्रष्टाचार के आरोप और फिर हिंसक टकरावों के बाद बनी राजनीतिक खाली जगह को इस चुनाव ने भरा है। इन चुनावों का महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि यह उस उथल पुथल के बाद हुए हैं जिसने शेख हसीना की पंद्रह साल पुरानी सरकार को गिरा दिया था। छात्र आंदोलन पर सख्त कार्रवाई, बड़ी संख्या में जान हानि और उसके बाद हसीना का देश छोड़ना बांग्लादेश के लोकतांत्रिक इतिहास की बड़ी घटनाएं बन चुकी हैं। अंतरिम सरकार के रूप में नोबेल सम्मान पा चुके मुहम्मद यूनुस ने देश को चुनाव तक पहुंचाया, लेकिन उनका कार्यकाल भी तमाम तरह के विवादों से भरा रहा।
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चुनाव परिणामों में बीएनपी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 297 सीटों में से 212 सीटें जीत कर साफ बहुमत हासिल कर लिया है। जमात ए इस्लामी के नेतृत्व वाले गठबंधन को 77 सीटें मिलीं, जबकि बाकी सीटें निर्दलीय और छोटे दलों के खाते में गईं। यह भी उल्लेखनीय है कि तीन दशक में पहली बार शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग का चुनाव चिह्न नाव मतपत्र पर नहीं था, क्योंकि पार्टी को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया। इससे साफ है कि बांग्लादेश की राजनीति अब दो पुराने ध्रुवों की सीधी टक्कर से आगे बढ़कर नए समीकरण बना रही है।
तारिक रहमान की वापसी भी अपने आप में एक अलग राजनीतिक कथा है। कभी निर्वासन में रहे रहमान अब साठ वर्ष की उम्र में देश की बागडोर संभालने जा रहे हैं। अपनी मां और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के निधन के तुरंत बाद उन्होंने पार्टी की कमान संभाली थी और अब जीत को उनके नाम पर समर्पित करते हुए जश्न टालने की अपील की है। बीएनपी ने चुनाव परिणाम को लोकतंत्र की जीत बताया है और अपने कार्यकर्ताओं के बलिदान को याद किया है। साथ ही तारिक रहमान का 31 सूत्रीय विकास कार्यक्रम एक कल्याणकारी सरकार बनाने की बात करता है, जिससे साफ है कि वह केवल सत्ता नहीं बल्कि नीति आधारित वैधता भी चाहते हैं।
सामाजिक स्तर पर भी यह चुनाव अहम रहा। मतदान के दिन सुबह से लंबी कतारों में खड़े मतदाताओं ने यह संकेत दिया था कि लोग पारदर्शी चुनाव और स्थिर शासन चाहते हैं। साथ ही अल्पसंख्यक समुदाय खासकर हिंदू समाज पर हमलों की खबरों के बीच ढाका से बीएनपी के हिंदू नेता गायेश्वर चंद्र राय की जीत प्रतीकात्मक महत्व रखती है। यह नई सरकार के लिए एक संदेश भी है कि उसे अल्पसंख्यक सुरक्षा पर ठोस कदम उठाने होंगे। भारत पहले ही इस मुद्दे पर चिंता जता चुका है।
अब बात भारत बांग्लादेश संबंधों की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद फोन कर तारिक रहमान को बधाई दी और दोनों देशों की शांति, प्रगति और समृद्धि के लिए साथ काम करने की बात कही। यह कदम कूटनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। भारत ने संकेत दिया है कि वह बांग्लादेश की जनता के जनादेश का सम्मान करता है और नई सरकार के साथ काम करने को तैयार है, चाहे उसका राजनीतिक झुकाव कुछ भी हो।
आने वाले दिनों में इसके कई असर दिख सकते हैं। सीमा सुरक्षा और अवैध घुसपैठ जैसे मुद्दों पर संवाद जारी रह सकता है, क्योंकि यह दोनों देशों की साझा चिंता है। साथ ही व्यापार और संपर्क परियोजनाएं, जैसे सड़क, रेल और नदी मार्ग सहयोग, नई सरकार के लिए भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, इसलिए इन पर चर्चा जारी रहने की संभावना है। इसके अलावा, अगर नई सरकार अल्पसंख्यक सुरक्षा पर भरोसा जगाती है तो द्विपक्षीय भरोसा और गहरा होगा।
हालांकि कुछ चुनौतियां भी रहेंगी। बीएनपी का अतीत भारत के प्रति हमेशा सहज नहीं रहा है और जमात-ए-इस्लामी जैसे दलों का प्रभाव भारत में चिंता पैदा कर सकता है। ऐसे में मोदी का शुरुआती फोन एक भरोसा बनाने वाला कदम है, जिससे नई दिल्ली यह दिखा रही है कि वह टकराव नहीं बल्कि सहयोग की राह चुनना चाहती है।
कुल मिलाकर देखें तो बांग्लादेश एक नए राजनीतिक अध्याय में प्रवेश कर रहा है। जनता ने बदलाव चुना है, पर अब असली परीक्षा शासन, आर्थिक सुधार, और सामाजिक सौहार्द की है। अगर तारिक रहमान स्थिरता, समावेशन और संतुलित विदेश नीति पर ध्यान देते हैं तो यह जीत बांग्लादेश के लिए नई दिशा बन सकती है। और यदि भारत और बांग्लादेश परिपक्वता से रिश्ते आगे बढ़ाते हैं तो पूरा दक्षिण एशिया इसका लाभ देख सकता है।
-नीरज कुमार दुबे
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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