बांग्लादेश चुनाव में बीएनपी को बहुमत
अवामी लीग की गैर मौजूदगी में बीएनपी 200 से ज्यादा सीटें जीत गई और जमात-ए-इस्लामी 74 सीटों के साथ सबसे बड़ा विपक्षी दल बनकर उभर गया. छात्र आंदोलन वाली पार्टी एनसीपी की एंट्री की खराब रही, एसएनपी को मात्र 6 सीटों के साथ ही संतोष करना पड़ा है. हालांकि अब जब बांग्लादेश में नयी सरकार बन रही है तो अवामी लीग का क्या होगा? यह एक ऐसा सवाल है, जिसका जवाब पूरी दुनिया जानना चाहती है. सवाल यह भी है कि क्या भविष्य में अवामी लीग बांग्लादेश में चुनाव लड़ पाएगी और क्या शेख हसीना कभी फिर से बांग्लादेश की सियासत में पहले जैसी सशक्त भूमिका में नजर आ पाएंगी? इसी सवाल को लेकर एबीपी न्यूज ने बांग्लादेश के आम लोगों से उनकी राय ली.
शेख हसीना पर क्यों गुस्सा हैं लोग?
बांग्लादेश में शेख हसीना को खिलाफ जो एक गुस्सा था, वो इस बार के चुनाव में वोट के माध्यम से कम पड़ता दिखाई दिया है. शेख हसीना के विरोधी की उनसे एक बड़ी शिकायत ये रही कि वो बीते चुनावों में अपना वोट नहीं डाल पा रहे थे. साल 2026 के चुनाव में बांग्लादेश के मतदाताओं ने मतदान किया. कई नागरिकों का यह मानना है कि अवामी लीग को देश की राजनीति में हिस्सा लेने देना चाहिए. कुछ लोगों ने कहा कि अब चुनाव खत्म हो गए हैं और नयी सरकार बनने जा रही है. इस सरकार गठन के बाद अवामी लीग को भी सक्रिय राजनीति का अवसर मिलना चाहिए.
बांग्लादेश की राजनीति में वापसी कर पाएगी अवामी लीग?
तारिक रहमान के कई समर्थक ने शेख हसीना के खिलाफ अपना भरपूर गुस्सा दिखाया, लेकिन इसी बातचीत के दौरान युवाओं ने यह भी कहा कि अवामी लीग बांग्लादेश में राजनीति कर सकती है. युवाओं ने कहा, ‘शेख हसीना के बेटे और बेटी अवामी लीग की राजनीति का चेहरा हो सकते हैं, हमें उनसे कोई आपत्ति नहीं है. बांग्लादेश की जनता आगे तय करेगी कि किस दल की सरकार देश में होनी चाहिए, लेकिन अब अवामी लीग राजनीतिक तौर पर यहाx अपना काम शुरू कर सकती है.’
आवामी लीग के समर्थक ने किसे दिया वोट?
बांग्लादेश की राजनीति में एक बात और गौर करने वाली है. बांग्लादेश की जनता को बीएनपी और अवामी लीग की लत लग चुकी है. एक तरह से देखा जाए तो बांग्लादेश में इन दोनों ही दलों का प्रभाव हमेशा बना रहेगा, चाहे कभी कम या कभी ज्यादा. अवामी लीग के चुनावी प्रतिबंध के कारण सीधा फायदा बीएनपी को पहुंचा है. अवामी लीग के जो समर्थक अभी तक शेख हसीना को वोट किया करते थे, वो मजबूरी में बीएनपी के साथ गए क्योंकि अवामी लीग के समर्थक किसी भी कीमत पर बांग्लादेश में पाकिस्तान समर्थक जमात-ए-इस्लाम को सत्ता में नहीं आने देना चाहते हैं. बांग्लादेश में अवामी लीग समर्थकों की संख्या भी बहुत अच्छी खासी है, बस वो नए राजनीतिक समीकरण में शांत बैठकर अपने समय का इंतजार कर रहे हैं.
जमात ए इस्लामी बांग्लादेश की स्थिरता के लिए चुनौती
बांग्लादेश चुनाव 2026 में जमात ए इस्लामी के राजनीतिक उभार के बाद बांग्लादेश में राजनीतिक स्थिरता एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है. जमात ए इस्लामी के बेहद कट्टर विचार बीएनपी और अवामी लीग दोनों के समर्थकों को पसंद नहीं आते हैं. यहां के युवाओं ने जमात ए इस्लामी और एनसीपी गठबंधन से दूरी बनाई और बीएनपी के साथ गए.
बांग्लादेश में बदले हुए समीकरण में अवामी लीग की वापसी बहुत आसान तो नहीं होगी, लेकिन नामुमकिन कतई नहीं है. आज भी अवामी लीग का एक बड़ा वोट बैंक है और एक मजबूत काडर है. अगर आने वाले दिनों में बांग्लादेश में अवामी लीग से चुनावी प्रतिबंध हटता है तो एक बार फिर से देश में बीएनपी बनाम अवामी लीग के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता नजर आ सकती है.
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