Bangladesh Politics: बांग्लादेश की राजनीति में इस बार बड़ा और चौंकाने वाला मोड़ आया है. आम चुनाव के बाद तीन ऐसे नेता अचानक किस्मत वाले बन गए हैं, जिन पर कुछ समय पहले तक गंभीर आरोप थे और जिनमें से कुछ को तो मौत की सजा भी मिल चुकी थी. इनमें दो नेता बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के हैं, जिसका नेतृत्व तारिक रहमान कर रहे हैं, और एक नेता जमात-ए-इस्लामी से जुड़ा है.
ये तीनों नेता उस समय बड़े मामलों में फंसे हुए थे, जब शेख हसीना देश छोड़कर भारत चली गई थीं. इसके बाद नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस लौटे और उन्होंने बांग्लादेश की सत्ता संभाली. उनके आने के बाद इन तीनों नेताओं के खिलाफ चल रहे सारे मामले खत्म कर दिए गए.
ये तीनों नेता हैं कौन?
पहले दो नेता हैं लुत्फोज्जमान बाबर और अब्दुस सलाम पिंटू, जो बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी से हैं. तीसरे नेता हैं एटीएम अजहरुल इस्लाम, जो जमात-ए-इस्लामी से जुड़े हैं. अब ये तीनों नई संसद का हिस्सा बनने जा रहे हैं. यह वही बांग्लादेश है, जिसके भारत के साथ रिश्ते पिछले कुछ समय से तनाव भरे रहे हैं.
दिसंबर 2024 में बांग्लादेश की एक अदालत ने तारिक रहमान, लुत्फोज्जमान बाबर और कुछ अन्य लोगों को 21 अगस्त 2004 के ग्रेनेड हमले से जुड़े मामलों में बरी कर दिया था. यह हमला शेख हसीना को निशाना बनाकर किया गया था. वे तो बच गई थीं, लेकिन इस हमले में 24 लोगों की जान चली गई थी. इस चुनाव में लुत्फोज्जमान बाबर ने अपने नजदीकी प्रतिद्वंदी को करीब एक लाख साठ हजार वोटों से हराया.
भारत के लिए चिंता का नाम है पिंटू
बाबर के साथी अब्दुस सलाम पिंटू को लेकर भारत की चिंता ज्यादा बताई जा रही है. बाबर के बरी होने के करीब एक साल बाद पिंटू को भी राहत मिली और उनके खिलाफ लगे आरोप हटा दिए गए. पिंटू पर आरोप था कि वे पाकिस्तान के एक आतंकी संगठन का समर्थन करते थे, जिस पर भारत में कई हमलों का आरोप है. इनमें वाराणसी अदालत परिसर में धमाका, अजमेर शरीफ दरगाह में विस्फोट और दिल्ली में हुए धमाके शामिल हैं. इस बार पिंटू ने करीब दो लाख वोटों से जीत हासिल की है.
अजहर उल इस्लाम की कहानी
तीसरे “किस्मत वाले” नेता अजहर उल इस्लाम जमात के पुराने नेता हैं. वे 1998 से राजनीति में हैं और 2012 तक संगठन के महासचिव भी रह चुके हैं. उन पर 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान बारह सौ से ज्यादा लोगों की मौत का जिम्मेदार होने का आरोप था. इसके अलावा उन पर तेरह बलात्कार के मामले भी दर्ज थे. इन सभी मामलों में उन्हें 2014 में मौत की सजा सुनाई गई थी, लेकिन बाद में यूनुस के दौर में उन्हें माफ कर दिया गया और सभी आरोपों से बरी कर दिया गया. इन तीनों नेताओं के नाम कभी मौत की सजा से जुड़े थे, लेकिन अब कुछ ही दिनों में, जब तारिक रहमान शपथ लेंगे, तब ये तीनों बांग्लादेश की संसद में बैठेंगे.
दिल्ली की नजर और आगे की राजनीति
नई दिल्ली के नजरिए से यह चुनाव नतीजा, यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौर से बिल्कुल अलग रास्ता दिखाता है. भारतीय अधिकारियों के मुताबिक वह समय काफी उथल-पुथल भरा था. अब सबकी नजर तारिक रहमान पर है. भारतीय अधिकारी उन्हें लेकर “सावधानी भरी उम्मीद” जता रहे हैं. उनका मानना है कि भले ही पहले उनकी पार्टी की सरकारों से मतभेद रहे हों, लेकिन अब तारिक रहमान देश की आर्थिक जरूरतों और इलाके की शांति को देखते हुए ज्यादा व्यावहारिक नीति अपना सकते हैं.
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