बीएनपी यानि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी, जो कि यहां की पुरानी पार्टियों में से एक है. इस पार्टी की स्थापना 1 सितंबर, 1978 में तत्कालीन राष्ट्रपति जियाउर्रहमान ने की थी. BNP की तरफ से खालिदा जिया पहली बार 1991 में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनीं. दूसरी बार साल 2001 में बीएनपी की खालिदा जिया ने बांग्लादेश में सरकार बनाई. हालांकि इस सरकार में जमात ए इस्लामी भी शामिल हुआ था, लेकिन साल 2006 के बाद से बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी कभी भी सत्ता में वापस नहीं आ पाई.
बीएनपी और जमात के बीच मुकाबला
इस दौरान 2009, 2014, 2018 और 2024 के आम चुनावों में शेख हसीना की अवामी लीग की बंपर जीत हुई. साल 2014 के चुनावों में बीएनपी ने धांधली के आरोप लगाए तो वहीं 2024 के आम चुनाव का बीएनपी ने बहिष्कार कर दिया. हालांकि अब 5 अगस्त, 2024 को बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद बांग्लादेश में सब कुछ बदल चुका है. अब अवामी लीग पर चुनावी प्रतिबंध लग चुका है और बड़ी पार्टी के तौर पर बीएनपी जरूर दिखाई दे रही है. साल 2026 के आम चुनाव में सिर्फ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात ए इस्लामी के बीच ही मुकाबला दिखाई दे रहा है.
ढाका पहुंचते ही तारिक रहमान ने संभाली पार्टी की कमान
शेख हसीना के तख्तापलट से पहले खालिदा जिया जेल में थीं और उनके बेटे तारिक रहमान लंदन में निर्वासित जीवन जी रहे थे. शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद खालिदा जिया को जेल से रिहा किया गया और उनके बेटे तारिक रहमान भी लंबे समय के बाद लंदन से ढाका लौटे. तारिक रहमान ऐसे समय में बांग्लादेश पहुंचे, जब उनकी मां खालिदा जिया बेहद बीमार थीं और अस्पताल में भर्ती थीं. तारिक रहमान ने ढाका पहुंचते ही पार्टी की कमान संभाली और आम चुनाव की तैयारियों में जुट गए. चुनाव की घोषणा के कुछ दिनों बाद ही खालिदा जिया का निधन हो गया.
ऐसे में तारिक रहमान के सामने चुनौती यह है कि इतने लंबे समय से बांग्लादेश से दूर रहने के बाद वो पार्टी को कितना समझ पाएंगे और जनता की नब्ज कितनी पकड़ पाएंगे. यह जरूर है कि विकल्प हीनता का फायदा तारिक रहमान को मिलेगा. यह भी कहा जा सकता है कि मां खालिदा जिया के निधन का सहानुभूति फ़ैक्टर भी तारिक रहमान के साथ होगा, लेकिन 17-18 साल तक अपने देश से दूर रहना एक लंबा समय होता है. इस दौरान पूरी एक पीढ़ी बदल जाती है तो क्या तारिक रहमान सच में बांग्लादेश की जनता की आवाज सुन पाएंगे? वहीं क्या बांग्लादेश की जनता तारिक रहमान पर भरोसा कर पाएगी?
तारिक रहमान ने चुनाव प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ी
तारिक रहमान ने अपने चुनाव प्रचार में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. उन्होंने इस चुनाव में नारा दिया है- Bangladesh Before All. बांग्लादेश की 2 सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं और चुनावी घोषणापत्र भी जारी कर चुके हैं. बीएनपी 300 सीटों में से 292 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. 8 सीटें सहयोगी दलों के खाते में दी है. तारिक बीएनपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी हैं. चुनाव के दौरान ही दुनिया भर के डेलीगेशन और डिप्लोमैट ने तारिक रहमान से मुलाकात की. कुछ बड़े चुनावी वादे जो तारिक रहमान की तरफ से किए गए हैं-
1. जुलाई नेशनल चार्टर को लागू करेंगे. (यह छात्र आंदोलन की सबसे बड़ी मांग थी)
2. मुक्ति आंदोलन के सही इतिहास को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाएंगे.
3. बांग्लादेश में उप राष्ट्रपति का पद बनाएंगे.
4. कोई भी व्यक्ति अधिकतम 10 साल के लिए प्रधानमंत्री पद पर रह पाएगा.
5. संसद में 100 सदस्यीय उच्च सदन की स्थापना.
6. जुलाई, 2024 में हुई हत्याओं और हिंसा की जांच के लिए स्वतंत्र जांच आयोग का गठन.
7. पड़ोसी देशों के साथ सहयोग और समानता की दोस्ती के लिए प्रतिबद्ध.
8. मुस्लिम देशों के साथ सहयोग को मजबूत करेंगे.
बीएनपी के सामने क्या है चुनौती?
इसके अलावा बहुत सी फ्री योजनाओं का ऐलान भी तारिक रहमान की तरफ से किया गया है. उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती जमात-ए-इस्लामी गठबंधन है, क्योंकि उसके साथ युवाओं की नयी नवेली पार्टी NCP की भी गठबंधन है. ऐसे में तारिक रहमान के सामने चुनौती दोहरी है. एक तरफ जहां युवा वर्ग एनसीपी के साथ जा सकता है तो वहीं दूसरी तरफ जो इस्लामी शासन के कट्टर समर्थक हैं, वो जमात ए इस्लामी के साथ जा सकते हैं.
शेख हसीना के समर्थक का किसे मिलेगा सपोर्ट?
तारिक रहमान को सबसे बड़ा फायदा उस वर्ग मिल सकता है, जो शेख हसीना का समर्थक रहा है. जो बीते कई चुनावों में शेख हसीना के लिए वोट करता है. बांग्लादेश में अभी जो मौजूदा स्थिति है, इस सियासी हालात में शेख हसीना की अवामी लीग के समर्थक जमात ए इस्लामी के साथ तो बिल्कुल नहीं जाएंगे. इसका लाभ तारिक रहमान को मिल सकता है. दरअसल शेख हसीना के समर्थक जमात ए इस्लामी को इसलिए नहीं स्वीकार कर सकते हैं क्योंकि वह 1971 में बांग्लादेश मुक्ति आंदोलन के विरोध में खड़ी थी. वहीं शेख हसीना ने अपने शासन काल में जमात ए इस्लामी पर कट्टरता फैलाने के कारण कई बार प्रतिबंध लगाए हैं. ऐसी परिस्थिति में अवामी लीग के समर्थक अगर जमात का साथ नहीं देंगे तो उसका सियासी फायदा तारिक रहमान की बीएनपी को जरूर होगा.
भारत के साथ संबंधों पर रहेगी दुनिया की नजर
भारत के साथ संबंधों को लेकर भी तारिक रहमान पर सभी की नजरें हैं. बांग्लादेश की आम जनता पूरी तरह से यह चाहती है कि बांग्लादेश में जो भी सरकार बने, वो भारत से संबंध बहुत अच्छे करके रखे. बांग्लादेश की जनता भारत को बहुत आदर और सम्मान के साथ देखती है. बांग्लादेश के लोग भारत के साथ संबंधों को हमेशा किसी भी अन्य देश से बहुत आगे रखती है. हाल ही में जब तारिक रहमान की मां खालिदा जिया का निधन हुआ था, तब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शोक संवेदना व्यक्त की.
भारत के विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर ने ढाका का दौरा किया था और खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में शामिल हुए थे. इस दौरान भारत के विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से एक शोक संदेश भी तारिक रहमान को सौंपा था. यह चुनाव और उसके नतीजे दोनों ही तारिक रहमान और बीएनपी के सियासी भविष्य के लिए बड़े महत्वपूर्ण साबित होने वाले हैं.
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