नासा का वैन एलन प्रोब ए सैटेलाइट करीब 14 साल अंतरिक्ष में रहने के बाद अब पृथ्वी की ओर लौट रहा है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 10–11 मार्च के बीच यह वायुमंडल में प्रवेश करेगा, जहां इसका अधिकांश हिस्सा जल सकता है.
14 साल से अंतरिक्ष में था नासा का यह सैटेलाइट
- नासा ने इस सैटेलाइट को अगस्त 2012 में लॉन्च किया था. इसे उसके जुड़वां सैटेलाइट वैन एलन प्रोब बी (Van Allen Probe B) के साथ अंतरिक्ष में भेजा गया था. दोनों का मिशन पृथ्वी के चारों ओर मौजूद रेडिएशन बेल्ट्स का अध्ययन करना था.
- लगभग सात साल तक सक्रिय रहने के बाद 2019 में दोनों सैटेलाइट्स को डी-एक्टिवेट कर दिया गया था. इसके बाद से वे धीरे-धीरे अपनी कक्षा में नीचे आते रहे और अब वैन एलन प्रोब ए का मिशन पूरी तरह खत्म होने वाला है.
- अमेरिकी स्पेस फोर्स के अनुमान के अनुसार यह सैटेलाइट 10 मार्च की रात (भारतीय समय के अनुसार 11 मार्च तड़के) पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर सकता है.
- वैज्ञानिकों ने इसके लिए लगभग 24 घंटे की समय-सीमा (विंडो) तय की है, यानी वास्तविक समय थोड़ा आगे-पीछे हो सकता है.
- नासा के वैज्ञानिक लगातार इसकी ट्रैकिंग कर रहे हैं ताकि इसके रास्ते और संभावित गिरने के स्थान का अनुमान लगाया जा सके.
धरती पर नुकसान की संभावना बेहद कम है. - वैज्ञानिकों के मुताबिक किसी इंसान के घायल होने की संभावना 4,200 में से 1 यानी लगभग 0.02% है, जो बेहद कम मानी जाती है.
- इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि पृथ्वी की लगभग 70 प्रतिशत सतह समुद्र से ढकी हुई है, इसलिए अगर कोई मलबा बचता भी है तो उसके खुले समुद्र में गिरने की संभावना ज्यादा है.
कब टकरा सकता है सैटेलाइट?
अमेरिकी स्पेस फोर्स के मुताबिक यह सैटेलाइट भारतीय समय के अनुसार 11 मार्च को तड़के पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर सकता है. वैज्ञानिकों ने इसके लिए करीब 24 घंटे की समय-सीमा तय की है, क्योंकि इतनी तेज रफ्तार से गिर रहे ऑब्जेक्ट की सटीक टाइमिंग बताना मुश्किल होता है. नासा के वैज्ञानिक लगातार इसकी ट्रैकिंग और मॉनिटरिंग कर रहे हैं ताकि इसके रास्ते और संभावित गिरने की जगह का अंदाजा लगाया जा सके.
क्या सच में आ सकती है आफत?
वैज्ञानिकों का कहना है कि जब सैटेलाइट पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करेगा तो तेज घर्षण और गर्मी की वजह से इसका अधिकांश हिस्सा जलकर राख हो जाएगा. फिर भी संभावना है कि कुछ मजबूत धातु के हिस्से पूरी तरह न जलें और वे मलबे के रूप में नीचे गिरें. नासा के अनुसार किसी इंसान को चोट लगने की संभावना 4,200 में से सिर्फ 1 यानी लगभग 0.02 प्रतिशत है. यानी खतरा बेहद कम है.
अगर मलबा बचा तो कहां गिरेगा?
पृथ्वी की लगभग 70 प्रतिशत सतह समुद्र से ढकी हुई है, इसलिए वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर कोई टुकड़ा बचता भी है तो उसके खुले समुद्र में गिरने की संभावना सबसे ज्यादा है. किसी बड़े शहर या आबादी वाले इलाके में गिरने की संभावना बहुत कम मानी जा रही है.
क्यों नहीं पता चल पाता सटीक स्थान?
ऐसे मामलों में सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि सैटेलाइट बहुत तेज गति से पृथ्वी की ओर आता है. जब वह वायुमंडल में प्रवेश करता है तो हवा के दबाव और तापमान की वजह से उसकी दिशा बदल सकती है. इसी वजह से वैज्ञानिक पहले से यह तय नहीं कर पाते कि उसका मलबा किस देश या किस समुद्र में गिरेगा.
आखिर क्यों भेजा गया था यह सैटेलाइट?
इस मिशन का उद्देश्य था पृथ्वी के चारों ओर मौजूद वैन एलन रेडिएशन बेल्ट्स का अध्ययन करना है. ये ऊर्जा से भरे कणों की दो परतें होती हैं जो सौर तूफानों और अंतरिक्ष के रेडिएशन से पृथ्वी की रक्षा करने में अहम भूमिका निभाती हैं. शुरुआत में इस मिशन का नाम रेडिएशन बेल्ट स्टॉर्म प्रोब्स रखा गया था, लेकिन बाद में रेडिएशन बेल्ट की खोज करने वाले वैज्ञानिक जेम्स वैन एलन के सम्मान में इसका नाम वैन एलन प्रोब्स कर दिया गया. करीब एक दशक तक अंतरिक्ष से अहम वैज्ञानिक जानकारी जुटाने के बाद अब यह सैटेलाइट अपनी आखिरी यात्रा पर है.
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Anoop Kumar Mishra is associated with News18 Digital for the last 6 years and is working on the post of Assistant Editor. He writes on Health, aviation and Defence sector. He also covers development related to …और पढ़ें
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