प्यार जो ताजमहल के साथ अमर हो गया
मुगल साम्राज्य के इतिहास में शाहजहां और मुमताज़ महल की कहानी सबसे रोमांटिक और दुखद प्रेमगाथाओं में एक है. 1607 में जब राजकुमार खुर्रम जिन्हें बाद में शाहजहां के तौर पर जाना गया, वह तब केवल 14-15 साल के थे. आगरा के मीना बाज़ार में घूम रहे थे. ये एक विशेष बाज़ार था जहां राजपरिवार की महिलाएं बिना पर्दे के खरीदारी कर सकती थीं. वहां उनकी नज़र 14 वर्षीय अर्जुमंद बानू बेगम पर पड़ी, जो एक फारसी कुलीन परिवार की बेटी थीं. उनकी सुंदरता, बुद्धिमत्ता और शालीनता ने राजकुमार को पहली नज़र में मोह लिया.
पांच साल बाद 10 मई 1612 को 20 वर्षीय खुर्रम और 19 वर्षीय अर्जुमंद का निकाह हुआ. शाहजहां ने अपनी बेगम को “मुमताज़ महल” की उपाधि दी, जिसका अर्थ है “महल की सर्वोत्तम” या “प्रासाद का आभूषण”. बाद में मुमताज महल मुगल साम्राज्य की सबसे ताकतवर रानी भी साबित हुई. वह शाहजहां की सबसे विश्वसनीय सलाहकार, सहचरी और राजनीतिक सहयोगी थी. युद्ध में भी साथ जाती थीं, यहां तक कि गर्भावस्था के दौरान भी. उसने 14 बच्चों को जन्म दिया, जिनमें से 8 जीवित रहे, जिनमें दारा शिकोह, औरंगज़ेब, जहांआरा बेगम शामिल हैं.
1631 में, बुंदेलखंड के दक्कन अभियान के दौरान, बुरहानपुर में मुमताज़ महल ने अपनी 14वीं संतान गौहरआरा बेगम को जन्म दिया. प्रसव के तुरंत बाद उसकी मृत्यु हो गई. उस समय वो केवल 38 साल की थी. शाहजहां इस सदमे से टूट गए. कई दिनों तक सार्वजनिक रूप से नहीं निकले, दाढ़ी-बाल सफेद हो गए. शोक में डूब गए. कहा जाता है कि उन्होंने मुमताज़ से चार वादे लिए थे – उनकी याद में एक भव्य स्मारक बनवाना, फिर विवाह करना, बच्चों के प्रति दयालु रहना और प्रतिवर्ष उनकी कब्र पर जाना.
शाहजहां ने अपनी प्रियतमा की याद में आगरा के यमुना किनारे एक अद्भुत स्मारक बनवाने का फैसला किया – ताजमहल. ये 1632 में बनना शुरू हुआ और 1653 में पूरा हुआ. 20,000 से अधिक कारीगरों, वास्तुकारों और मजदूरों ने 22 वर्षों में इसे बनाया. सफेद संगमरमर से निर्मित यह मकबरा, चार मीनारों, बड़े गुंबद और जटिल जालीदार काम के साथ, दुनिया के सात अजूबों में शामिल है. ताजमहल प्रेम का प्रतीक बन गया, जहां शाहजहां और मुमताज़ की कब्रें एक-दूसरे के समानांतर हैं, जैसे दोनों कभी अलग न हों. ताजमहल अब दुनियाभर में प्रेम का सबसे बड़ा प्रतीक है.
बीटल्स के लेनन की लव स्टोरी
1966 में लंदन की इंडिका गैलरी में जब जॉन लेनन ने योको ओनो की कलाकृति ‘सीलिंग पीस’ देखी, तो उन्हें इसे बनाने वाली कलाकार से ऐसा प्यार हो जाएगा कि उसकी कहानी आने वाले सालों में अमर हो जाएगी. योको एक ऐसी कलाकार थीं, जिनकी कला परंपराओं को तोड़ती थी. जॉन दुनिया के सबसे बड़े बैंड द बीटल्स के सदस्य थे. जब दोनों मिले तो दुनिया में तूफान जैसा ही आ गया. उनका प्रेम सार्वजनिक था. उन्मुक्त था. उन्होंने इसे छिपाया नहीं. लेकिन लेनन के प्रशंसकों को ये मिलन जरा भी अच्छा नहीं लगा. लोग योको को कोसते थे. अपमान करते थे. बीटल्स के टूटने का पूरा दोष देते थे. खुद बीटल्स बैंड के दूसरे संगीत साथी भी योको को ऐसी महिला बताया जिसने सबसे महान बैंड को तोड़ दिया. लेकिन लेनन ने कभी उसका साथ नहीं छोड़ा. वह हर जगह योको के साथ ही होते थे – स्टूडियो में, प्रेस कॉन्फ्रेंस में और हर उस मंच पर जहां उन्हें बुलाया जाता था.
1969 में उन्होंने शादी की. एम्स्टर्डम और मॉन्ट्रियल के होटलों के बिस्तरों से उन्होंने दुनिया को संदेश दिया. “युद्ध नहीं, शांति चाहिए.” यह प्रेम का सबसे राजनीतिक रूप था. जब दुनिया हथियारों की होड़ में थी, ये दो प्रेमी शांति का गीत गा रहे थे. ‘इमेजिन’ वह गीत बना, जिसमें योको की अवधारणा और लेनन की आवाज़ ने मिलकर एक ऐसी दुनिया की तस्वीर खींची, जहां प्रेम ही सबसे बड़ी ताकत है.
उन्होंने साथ मिलकर वियतनाम युद्ध का विरोध किया. साथ मिलकर संगीत रचा. साथ मिलकर एक ऐसी दुनिया का सपना देखा,जहां कला और प्रेम राजनीति से ऊपर हों. 8 दिसंबर 1980 को न्यूयॉर्क में जब एक पागल प्रशंसक ने लेनन की हत्या कर दी, तो योको ने अपने जीवन का सबसे बड़ा घाव झेला. लेकिन उन्होंने लेनन की विरासत को मरने नहीं दिया. आज भी वह उनके संगीत, संदेश और उस प्रेम को जीवित रखे हुए हैं. जॉन और योको ने साबित किया कि प्रेम सिर्फ़ दो लोगों के बीच का भाव नहीं है. ये दुनिया को बदलने की ताकत रखता है.
लोगों ने उनके प्रेम का मजाक उड़ाया
1920 के दशक के आखिर में मेक्सिको सिटी के कला जगत में फ्रीडा काल्हो और डिएगो रिविएरा की मुलाक़ात हुई. दोनों कलाकार थे. फ्रीडा तब युवा थीं, हाल ही में भयानक बस दुर्घटना से उबर रही थीं. डिएगो उनसे बीस साल बड़े थे. मशहूर भित्ति-चित्रकार. राजनीतिक रूप से मुखर कम्युनिस्ट. 1929 में दोनों ने विवाह किया. लोगों ने इसे “हाथी और कबूतर” की शादी कहा. डिएगो के भारी शरीर और फ्रीडा की नाज़ुक काया के कारण.
दोनों ने एक-दूसरे को खुली आज़ादी देने की बात की, पर ईर्ष्या और असुरक्षा उनके बीच लगातार मौजूद रही. डिएगो के कई प्रेम संबंध रहे – यहां तक कि फ्रीडा की बहन क्रिस्टीना के साथ भी. यह घटना फ्रीडा के लिए गहरे विश्वासघात की तरह थी. जवाब में फ्रीडा ने भी रिश्ते बनाए, जिनमें पुरुष और महिलाएं दोनों शामिल थे.
1939 में दोनों का तलाक हो गया. लेकिन दोनों एक दूसरे के बगैर नहीं रह सके. एक साल बाद 1940 में उन्होंने दोबारा विवाह कर लिया. दोनों एक दूसरे के प्रशंसक भी थे. दोनों की कला पर भी एक दूसरे का असर पड़ा. 1954 में फ्रीडा की मृत्यु हुई. डिएगो ने स्वीकार किया, “मेरे जीवन का सबसे सच्चा प्रेम फ्रीडा थी.”
यह कहानी सिखाती है कि प्रेम हमेशा संतुलित नहीं होता. कभी-कभी संघर्ष, चोट और आत्म-खोज के बीच आकार लेता है. फ्रीडा और डिएगो का रिश्ता स्थिर नहीं था लेकिन उसमें झूठ कम था. इसी वजह से दुनिया की अमर प्रेम कहानियों में शुमार होता है.
जब ब्रिटेन के राजा ने प्रेम के लिए गद्दी छोड़ दी
1936 का वर्ष ब्रिटिश इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना के लिए याद किया जाता है. जब राजा एडवर्ड अष्टम ने प्रेम के लिए सिंहासन त्याग दिया. ये कहानी प्रेम, कर्तव्य, परंपरा और व्यक्तिगत चुनाव के बीच टकराव की है.
एडवर्ड, जॉर्ज पंचम के सबसे बड़े बेटे थे. 1894 में जन्मे थे. आकर्षक, आधुनिक विचारों वाले लेकिन जिम्मेदारियों से कुछ कतराते हुए. जनवरी 1936 में पिता की मृत्यु पर वे राजा बने, लेकिन उनका राज्याभिषेक अभी हुआ ही नहीं था. इसी बीच उनकी जिंदगी में वॉलिस सिम्पसन नाम की अमेरिकी महिला आईं. दो बार की तलाकशुदा. 1930 के दशक में एडवर्ड से उनकी मुलाकात हुई. फिर गहरा प्रेम हो गया.
एडवर्ड उन्हें “द वुमन आई लव” कहते थे. वॉलिस चालाक, आकर्षक और आत्मविश्वासी थीं, लेकिन ब्रिटिश उच्च वर्ग उन्हें “अमेरिकी तलाकशुदा” मानकर अस्वीकार करता था. समस्या तब गंभीर हुई जब वॉलिस ने 1936 में दूसरा तलाक पूरा किया. एडवर्ड ने उससे शादी की इच्छा जाहिर की. ब्रिटिश सरकार, प्रधानमंत्री स्टैनली बाल्डविन, चर्च ऑफ इंग्लैंड और संसद इसके सख्त खिलाफ थे. चर्च ऑफ इंग्लैंड तलाक को पाप मानता था, खासकर जब दूसरा पति जीवित हो. एक तलाकशुदा महिला को रानी बनाना अस्वीकार्य था.
नैतिक और संवैधानिक संकट पैदा हो गया. एडवर्ड ने एक विकल्प सुझाया – मॉर्गनेटिक मैरिज, जिसमें वॉलिस रानी नहीं बनतीं, सिर्फ डचेस. सरकार ने इसे भी ठुकरा दिया. एडवर्ड ने स्पष्ट कहा कि वे वॉलिस के बिना राज नहीं कर सकते.
दिसंबर 1936 में संकट चरम पर पहुंचा. 10 दिसंबर को एडवर्ड ने अब्डिकेशन इंस्ट्रूमेंट पर हस्ताक्षर किए. 11 दिसंबर को रेडियो पर प्रसिद्ध भाषण दिया:
“मैंने पाया है कि… बिना उस महिला के सहारे के, जिससे मैं प्यार करता हूं, राजा के कर्तव्यों को निभाना असंभव है.” उन्होंने राजगद्दी छोड़ दी. उनके छोटे भाई अल्बर्ट अब राजा बने.
एडवर्ड ने 1937 में फ्रांस में वॉलिस से शादी की. उन्होंने जीवन भर निर्वासित-सा जीवन जिया – यूरोप में घूमते रहे. प्रेम के लिए सिंहासन त्याग आज भी दुनिया की सबसे प्रसिद्ध बलिदान कहानियों में शुमार है, जहां प्यार ने इतिहास की दिशा मोड़ दी.
प्रयोगशाला का प्रेम – मैरी क्यूरी और पियरे क्यूरी
कुछ प्रेम कहानियां विज्ञान की प्रयोगशालाओं में भी बनती हैं. मैरी और पियरे क्यूरी का रिश्ता ठीक वैसा ही था. ये प्रेम भावुकता से अधिक सहयोग पर टिका था. टिकाऊ और प्रभावशाली साबित हुआ.
मैरी का पूरा मारिया सलोमिया स्क्वोडोव्स्का था. उनका जन्म 7 नवंबर 1867 को वारसॉ, पोलैंड में हुआ। गरीबी के बाद भी पढ़ाई के लिए संघर्ष किया. 1891 में पेरिस आईं. सोर्बोन विश्वविद्यालय में दाखिला लिया. 1893 में भौतिकी तथा 1894 में गणित में डिग्री हासिल की.
पियरे क्यूरी का जन्म 15 मई 1859 को पेरिस में हुआ. वह पहले से ही प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी थे. उन्होंने अपने भाई जैक्स के साथ पाइजोइलेक्ट्रिसिटी की खोज की थी और क्रिस्टलोग्राफी में काम किया था. 1894 में पोलिश भौतिक विज्ञानी जोज़ेफ विएरुश-कोवाल्स्की के माध्यम से मैरी की मुलाकात पियरे से हुई. पियरे ने उन्हें अपनी प्रयोगशाला में जगह दी. दोनों में विज्ञान के प्रति समान जुनून था. पियरे ने मैरी को शादी का प्रस्ताव दिया. मैरी ने मना कर दिया – डर था कि विवाह उनकी स्वतंत्रता और पोलैंड से जुड़ाव को प्रभावित करेगा.
हालांकि कुछ महीनों बाद उन्होंने पियरे से 26 जुलाई 1895 को सादे तरीके से सिविल मैरिज कर ली. विवाह के बाद मैरी ने यूरेनियम की रेडियोएक्टिविटी पर शोध शुरू किया. पियरे भी अपनी रिसर्च छोड़कर मैरी के साथ जुड़ गए. उन्होंने यूरेनियम अयस्क से रेडियोएक्टिव पदार्थ अलग किए. जुलाई 1898 में उन्होंने नये तत्व पोलोनियम की घोषणा की. पहली बार रेडियोएक्टिविटी शब्द का इस्तेमाल किया. दिसंबर 1898 में रेडियम की खोज की. ये काम आसान नहीं था. तब इतने उन्नत उपकरण भी नहीं थे.
1903 में मैरी, पियरे और बेकरेल को नोबेल पुरस्कार फिजिक्स में मिला. पहली बार कोई महिला नोबेल विजेता बनी. पहली बार कोई दंपति साथ जीता. खुशी ज्यादा दिन नहीं रही. 19 अप्रैल 1906 को पियरे की सड़क हादसे में मौत हो गई. मैरी टूट गईं लेकिन उन्होंने पियरे के शब्द याद किए: “तुम्हारे बिना भी काम जारी रखना चाहिए.” 1910 में शुद्ध रेडियम अलग किया. 1911 में नोबेल पुरस्कार केमिस्ट्री में अकेले जीता.
उनका प्रेम रोमांटिक गाथा नहीं, बल्कि साझा सपनों का परिणाम था. बाद में उनकी दो बेटियों में एक इरना ने भी नोबल जीता. मैरी ने प्रथम विश्व युद्ध में एक्स-रे मशीनें चलाईं। 4 जुलाई 1934 को रेडियम के संपर्क से एनीमिया से उनकी मृत्यु हुई.
मैरी-पियरे की कहानी बताती है कि सच्चा प्रेम सत्ता या सौंदर्य नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सपनों को पूरा करने में होता है. उनकी प्रयोगशाला ही उनका मंदिर थी, और रेडियम उनकी अमर प्रेम-निशानी.
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