मौत को भौतिक रूप से शरीर का अंत मानते हैं। लेकिन दुनिया के कुछ लोग इसे ‘रुकावट’ मानकर भविष्य में फिर से जीने की तैयारी कर रहे हैं। एमआईटी टेक्नोलॉजी रिव्यू की रिपोर्ट के मुताबिक, क्रायोनिक्स तकनीक के जरिए लोग अपने शरीर या सिर्फ दिमाग को 196 डिग्री सेल्सियस के तरल नाइट्रोजन में संरक्षित करवा रहे हैं, इस उम्मीद में कि भविष्य में विज्ञान इतना आगे बढ़ जाएगा कि उन्हें फिर जीवित कर दिया जाएगा।
क्रायोनिक्स कोई नई तकनीक नहीं है। 1967 में जेम्स बेडफोर्ड पहले व्यक्ति बने, जिन्हें इस तरीके से संरक्षित किया गया। यानी यह तकनीक करीब 60 साल पुरानी है। आज भी उनका शरीर संरक्षित है, हालांकि उस समय की तकनीक सीमित थी और कोशिकाओं को नुकसान ज्यादा होता था। इस प्रक्रिया की शरुआत मौत के तुरंत बाद होती है। शरीर को तेजी से ठंडा किया जाता है, फिर खून की जगह खास केमिकल क्रायो-प्रोटेक्टेंट डाले जाते हैं, ताकि कोशिकाओं में बर्फ न जमे। इसके बाद शरीर को धीरे-धीरे 196° डिग्री सेल्सियस तक ठंडा कर कांच जैसी अवस्था (विट्रिफिकेशन) में रखा जाता है। कुछ लोग पूरा शरीर संरक्षित कराते हैं, जबकि कुछ सिर्फ दिमाग, क्योंकि ये यादों और पहचान से जुड़ा है। भविष्य की तकनीक विकसित हो गई तो दिमाग को नए शरीर या अन्य नेटवर्क में ‘लिंक’ करना संभव होगा। रिसर्चर राल्फ मर्कल का मानना है कि भविष्य में नैनोटेक्नोलॉजी के विकास के साथ यह संभव हो सकता है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि फ्रीजिंग के दौरान कोशिकाएं और टिश्यू डैमेज हो जाते हैं, खासकर दिमाग जैसे जटिल अंग में। हालांकि आज की तकनीक पहले से बेहतर हो चुकी है, फिर भी रिवाइवल अभी विज्ञान की पहुंच से दूर है। हालांकि कई लोगों का मानना है कि भविष्य में मेडिकल साइंस इसे संभव करेगी। पूरा शरीर संरक्षित कराने में 2 करोड़ रुपए का खर्च दुनिया में अल्कोर लाइफ एक्सटेंशन फाउंडेशन (एरिजोना) और क्रायोनिक्स इंस्टिट्यूट (मिशिगन) जैसी संस्थाएं यह सेवा दे रही हैं। 500 से ज्यादा लोग क्रायोनिक्स के तहत संरक्षित किए जा चुके हैं। हजारों लोग भविष्य के लिए रजिस्ट्रेशन करा चुके हैं। पूरे शरीर को संरक्षित कराने में 1.5 से 2 करोड़ रु. तक लगते हैं। सिर्फ दिमाग (न्यूरो-) के लिए 60-70 लाख रु. खर्च आता है। कई लोग बीमा का सहारा लेते हैं।
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