मरीन प्रोडक्ट्स जैसे झींगा, ऑटो पार्ट्स और ज्वेलरी जैसे सेक्टर्स को सबसे ज्यादा मार पड़ी, लेकिन कुल मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट अप्रैल से सितंबर तक 2.9 फीसदी बढ़ गया. अप्रैल-सितंबर में अमेरिका को एक्सपोर्ट 13 फीसदी ऊपर रहा था, लेकिन सितंबर में 12 फीसदी नीचे आ गया था. ये फ्रंट-लोडिंग की वजह से हुआ, लेकिन असली सवाल तो ये है कि कैसे भारत ने गेम बदलने की रणनीति रखी. आइए इसे आपको 5 आसान प्वाइंट्स में समझाते हैं.
सवाल: ट्रंप टैरिफ ने सबसे ज्यादा किन सेक्टर्स को निशाना बनाया, और कितना नुकसान हुआ?
जवाब: सबसे ज्यादा झटका जेम्स एंड ज्वेलरी को लगा. सितंबर में अमेरिका का एक्सपोर्ट 76 फीसदी गिर गया. ऑटो कंपोनेंट्स में 12 फीसदी की कमी आ गई थी. मरीन प्रोडक्ट्स में झींगा सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ, जो कुल सीफूड एक्सपोर्ट का 65 फीसदी है और 4.88 अरब डॉलर का वैल्यू रखता है.
सिर्फ यही नहीं, स्पोर्ट्स गुड्स का 40 फीसदी हिस्सा अमेरिका पर निर्भर था, जिससे अक्टूबर में ओवरऑल एक्सपोर्ट 6 फीसदी नीचे आ गया. कॉटन गारमेंट्स में 25 फीसदी गिरावट, लेदर फुटवियर में 10 फीसदी की गिरावट आ गई. ये लो-मार्जिन सेक्टर्स जैसे कॉटन गारमेंट्स, स्पोर्ट्स गुड्स, कार्पेट्स और लेदर फुटवियर को चीन और आसियान देशों से कॉम्पिटिशन का डर भी था. ऐसे में इन सेक्टर्स ने सबसे ज्यादा टैरिफ की मार झेली.
सवाल: भारत ने नई मार्केट्स कैसे ढूंढी, और वहां कितना फायदा मिला?
जवाब: भारत का सबसे स्मार्ट कदम था, एक्सपोर्टर्स ने एशिया, वेस्ट एशिया और यूरोप की तरफ रुख कर लिया. मरीन प्रोडक्ट्स में सितंबर में 25 फीसदी और अक्टूबर में 11 फीसदी ग्रोथ हुई, चीन को 60 फीसदी, जापान को 37 फीसदी, थाईलैंड को 70 फीसदी ज्यादा शिपमेंट भेजा, जिससे भारत को बड़ा फायदा हुआ.
इसके अलावा मरीन प्रोडक्ट्स यूरोप को भी भेजा, और वहां 102 नई मरीन यूनिट्स को क्लियरेंस मिली, कुल 502 हो गईं, जो पिछले पांच साल से पेंडिंग थीं.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ज्वेलरी में कुल एक्सपोर्ट सिर्फ 1.5 फीसदी गिरा है. वहीं, यूएई में 79 फीसदी बढ़ा है , हॉन्गकॉन्ग में 11 फीसदी और बेल्जियम को 8 फीसदी की बढ़त हुई है. ऑटो कंपोनेंट्स में कुल 8 फीसदी ग्रोथ, जर्मनी, यूएई और थाईलैंड से मदद मिली है. कॉटन गारमेंट्स में यूएई, स्पेन, इटली और सऊदी अरब को बढ़ाया, लेकिन कुल 6 फीसदी गिरावट देखी गई है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 8 अरब डॉलर के एक्सपोर्ट में से 2 अरब डॉलर को रीडायरेक्ट कर लिया है. अक्टूबर में अमेरिका को कंटेनर शिपमेंट्स 18.4 फीसदी कम हुए, लेकिन इंडोनेशिया को 10.1 फीसदी, थाईलैंड को 3.6 फीसदी, वियतनाम को 3.6 फीसदी बढ़ा है.
सवाल: सरकार के सपोर्ट से डोमेस्टिक मार्केट को कैसे मजबूती मिली?
जवाब: सरकार ने लेबर-इंटेंसिव आइटम्स जैसे मरीन प्रोडक्ट्स के लिए डाइवर्सिफिकेशन पर जोर दिया. 45,060 करोड़ रुपये का पैकेज अप्रूव किया, जिसमें 20,000 करोड़ का क्रेडिट गारंटी स्कीम है, जो बैंक लोन पर गारंटी देती है. कॉमर्स डिपार्टमेंट ने कहा कि कीमतें तेज न गिराएं.
भारत और स्लोवेनिया ने उम्मीद जताई है कि इंडिया-यूरोपियन यूनियन के बीच जल्द फ्री ट्रेड एग्रीमेंट होगा. जो 12 फीसदी टैरिफ कम कर सकता है. FY24 में यूरोप को सीफूड एक्सपोर्ट 1.1 अरब डॉलर था, अब 20-25 फीसदी बढ़ सकता है. रूस को नई मार्केट के तौर पर देखा गया है, 25 फिशरी यूनिट्स को क्लियरेंस मिलने की उम्मीद है.घरेलू बाजार को मजबूत करने से एक्सपोर्टर्स ज्यादा रेजिलिएंट बने है.
सवाल: डिप्लोमेसी ने कैसे मदद की, और नेगोशिएशन का क्या रोल रहा?
जवाब: यूएस से अब ट्रेड डील की बातचीत आगे बढ़ चुकी है और यूरोप के साथ FTA ने मार्केट एक्सेस को सस्टेनेबल बनाया है. क्वालिटी अश्योरेंस पर फोकस से छोटे सेक्टर्स को फायदा मिला है, जैसे मरीन यूनिट्स की क्लियरेंस. एशिया और यूरोप में इनोफॉर्मल ट्रेड लिंकेज बढ़ाए है. रूस के साथ भी एक्सपोर्ट बेहतर हुआ है. भारत ने नेगोशिएशंस करके दिखाया है कि सिर्फ सामान बेचना नहीं, स्मार्ट बातचीत से नए दरवाजे खुलते हैं.
सवाल: ये रणनीति कितनी सफल रही, और आगे क्या प्लान है?
जवाब: भारत की रणनीति ने डाइवर्सिफिकेशन से टैरिफ इंपैक्ट को कम किया है. अमेरिका के टैरिफ के झटके ने भारतीय एक्सपोर्टर्स को मजबूर कर दिया कि वो नए-नए देशों में अपना माल बेचें और पिछले कुछ महीनों में जो शुरुआती संकेत मिले हैं, वो ये साफ कर देते हैं कि एशिया के अलग-अलग हिस्सों समेत दुनिया के दूसरे इलाकों से हमारे ट्रेड के रिश्ते मजबूत हुए हैं. इसी वजह से अमेरिका को कम माल बेचने का नुकसान कुछ हद तक कम हो गया. अब भारत आने वाले समय में अमेरिका के साथ ट्रेड डील करने वाला है जिससे दोनों ही देशों को बड़ा फायदा होगा.


